कल ही तो देखा था, आज बुझा -सा होने आया है, पर मैंने तो सोचा था — सपना एक साया है… मैं चलूँगी, वो चलेगा, मैं बढ़ूँगी, वो बढ़ेगा, जिसे तो अभी खिलना था, वो आज थम-सा होने आया है, पर मैंने तो सोचा था — सपना एक साया है… आँखें वही तेज़ हैं, पर सपने आज नम हैं, एक समय था— जब इसका कद आसमान छूता था, आज वही कद घटके कम-सा होने आया है, पर मैंने तो सोचा था — सपना एक साया है… अब जाना ये सच है, सपनों की भी एक उम्र होती है, जो कल तक लम्बी परछाई था, आज वही सिमट-सा होने आया है, जिसे मैं उम्रभर का साथी मानती थी, वो भी चुपचाप कहीं खोने आया है, पर मैंने तो हमेशा सोचा था— सपना एक साया है… -रिया बेलवाल