Skip to main content

Posts

Showing posts from November, 2025

सपना एक साया?

 कल ही तो देखा था, आज बुझा -सा होने आया है, पर मैंने तो सोचा था — सपना एक साया है… मैं चलूँगी, वो चलेगा, मैं बढ़ूँगी, वो बढ़ेगा, जिसे तो अभी खिलना था, वो आज थम-सा होने आया है, पर मैंने तो सोचा था — सपना एक साया है… आँखें वही तेज़ हैं, पर सपने आज नम हैं, एक समय था— जब इसका कद आसमान छूता था, आज वही कद घटके कम-सा होने आया है, पर मैंने तो सोचा था — सपना एक साया है… अब जाना ये सच है, सपनों की भी एक उम्र होती है, जो कल तक लम्बी परछाई था, आज वही सिमट-सा होने आया है, जिसे मैं उम्रभर का साथी मानती थी, वो भी चुपचाप कहीं खोने आया है, पर मैंने तो हमेशा सोचा था— सपना एक साया है… -रिया बेलवाल

The Weight of Welcome

  Slowly walking in my room, Wondering how I’ll find my way out— For the gates that once welcomed me Have now been firmly shut. Slowly walking in my room, Wondering if I should cut the ties, For the gates that once invited me Were nothing but heavy lies. Slowly walking in my room, Feeling like I want to ruin his elegant face, For the gates that once invited me Spoke in filtered grace. Slowly walking in my room, Breaking the silence, breaking the curse, For the gates that once invited me Are etched in my memory, deep and fierce. -Riya Belwal
 चाँद से पूछो उसका पता... वो अनजान है इस संसार की भीड़ से, कि किस तारे से है वो आज तक ख़फ़ा। नूर उस चाँद में कल भी झलकता था, आज भी झलकता है... प्यार तो सिर्फ़ एक शब्द है जनाब, इसे एक्सप्रेस आजकल कौन करता है? छिपे जज़्बात उस तारे में भी हैं, जो अपनी हल्की सी चमक में... अपना वजूद ज़ाहिर करता है। चाँद तो सबकी करता है, लेकिन चाँद की सिफ़ारिश कौन करता है? अब वक़्त आ गया है, चाँद को उस तारे से मिला दें, उनकी ख़ामोशी को आपस में मिला दें। ख़ैर... कुछ अच्छा होगा, कुछ अलग होगा, क्योंकि अब इशारा, शब्दों में बयां जो होगा। अब इस कहानी को हम सुनेंगे, क्योंकि "प्यार" जैसे शब्द को नज़रअंदाज़ कौन करता है? - रिया बेलवाल

नूर

  हां, मैंने सुनी एक ऐसी कहानी जो हक़ीक़त से है वाक़िफ़ और प्यार की है ज़ुबानी। कहानी की शुरुआत में वो अंजान लोग मिले, और अंत में हुए दूर... एक था सच्चा, निडर जवान — सिराज, तो दूसरी ओर मासूम एक लड़की —  नूर । क्रांति की उस होड़ में एक हिंसावादी था, तो एक थी अहिंसावादी... ख़ैर, नूर तो न रही, लेकिन उसकी तस्वीर उसने अपने दिलो-दिमाग़ में सजा ली। वक़्त तो तब आया जब सिराज और छत्रपाल शिकारी बने एक साज़िश की, मौन तो कई सब हुए, जब जलियांवाले बाग़ में ढेर पड़ी थी उन लाशों की। वसीम जैसे गद्दार लोग, दर्द दे गए सिराज, छत्रपाल, नूर और सबको, दर्द केवल किरदारों को नहीं हुआ, बल्कि उस कहानी को पढ़ने और सुनने वाले जैसे हमको... यह तो एक प्यार और क्रांति की निशानी, जो इतिहास बन गई...  { यह “नूर” नामक एक सुंदर रंगमंचीय नाटक का सारांश है,  जिसे राघव शर्मा ने लिखा है तथा राहुल गिरी के निर्देशन में प्रस्तुत किया गया है।  यह नाटक एक ऐसी युवती की कहानी है,  जिसने अपना जीवन तो खो दिया,  परंतु अपने पीछे जो प्रभाव छोड़ा — वह इतिहास बन गया। } यह प्रस्तुति प्रेम और त्याग की उस कथा को...