हां, मैंने सुनी एक ऐसी कहानी
जो हक़ीक़त से है वाक़िफ़ और प्यार की है ज़ुबानी।
कहानी की शुरुआत में वो अंजान लोग मिले,
और अंत में हुए दूर...
एक था सच्चा, निडर जवान — सिराज,
तो दूसरी ओर मासूम एक लड़की —
नूर।
क्रांति की उस होड़ में एक हिंसावादी था,
तो एक थी अहिंसावादी...
ख़ैर, नूर तो न रही,
लेकिन उसकी तस्वीर उसने अपने दिलो-दिमाग़ में सजा ली।
वक़्त तो तब आया जब सिराज और छत्रपाल
शिकारी बने एक साज़िश की,
मौन तो कई सब हुए,
जब जलियांवाले बाग़ में ढेर पड़ी थी उन लाशों की।
वसीम जैसे गद्दार लोग,
दर्द दे गए सिराज, छत्रपाल, नूर और सबको,
दर्द केवल किरदारों को नहीं हुआ,
बल्कि उस कहानी को पढ़ने और सुनने वाले जैसे हमको...
यह तो एक प्यार और क्रांति की निशानी,
जो इतिहास बन गई...
{ यह “नूर” नामक एक सुंदर रंगमंचीय नाटक का सारांश है, जिसे राघव शर्मा ने लिखा है तथा राहुल गिरी के निर्देशन में प्रस्तुत किया गया है। यह नाटक एक ऐसी युवती की कहानी है, जिसने अपना जीवन तो खो दिया, परंतु अपने पीछे जो प्रभाव छोड़ा —वह इतिहास बन गया। }
यह प्रस्तुति प्रेम और त्याग की उस कथा को दर्शाती है,
जो जलियाँवाला बाग़ की त्रासदी के समय घटित हुई थी।
Too good. Keep writing
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