चाँद

चाँद से पूछो उसका पता...

वो अनजान है इस संसार की भीड़ से,

कि किस तारे से है वो आज तक ख़फ़ा।


नूर उस चाँद में कल भी झलकता था, आज भी झलकता है...

प्यार तो सिर्फ़ एक शब्द है जनाब,

इसे एक्सप्रेस आजकल कौन करता है?


छिपे जज़्बात उस तारे में भी हैं,

जो अपनी हल्की सी चमक में... अपना वजूद ज़ाहिर करता है।

चाँद तो सबकी करता है,

लेकिन चाँद की सिफ़ारिश कौन करता है?


अब वक़्त आ गया है,

चाँद को उस तारे से मिला दें,

उनकी ख़ामोशियों को आपस में मिला दें।

ख़ैर...


कुछ अच्छा होगा, कुछ अलग होगा,

क्योंकि अब इशारा, शब्दों में बयां जो होगा।

अब इस कहानी को हम सुनेंगे,

क्योंकि "प्यार" जैसे शब्द को नज़रअंदाज़ कौन करता है?



- रिया बेलवाल

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